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Sikar hindi news : 40 फीट गहरे कुएं में तैरना सीखकर नेशनल लेवल का तैराक बन गया मजदूर का बेटा

सीकर. मन में यदि हौसला और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो सुविधाएं व संसाधनों का अभाव भी कोई मायने नहीं रखता। निरंतर अभ्यास एवं मेहनत का माद्दा हो तो विपरित परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है। जी हां, कुछ ऐसा ही कर दिखाया है राजस्थान के सीकर जिले के गांव बढ़ाडर निवासी साढ़े तीन फीट के राजेन्द्र बैरवा ने। जिसका कद भले ही छोटा है। लेकिन, सफलता की ऐसी इबारत लिखी है कि बड़े भी हैरान हैं। इस सख्स की खास बात यह है कि गांव में स्वीमिंग पुल का अभाव होने के कारण इसने महीनों कुएं में उतर कर तैरने का अभ्यास किया और उसके बलबूते आज इस खिलाड़ी का चयन राष्ट्रीय स्तर की पैरालंपिक स्वीमिंग प्रतियोगिता में हो पाया है। जो कि, उदयपुर में आठ नवंबर तक चलेगी।

 

दावा है कि 50 मीटर बैक स्ट्राक स्वीमिंग में राजस्थान का यह पहला बौना खिलाड़ी होगा। जो कि, राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में जिले का प्रतिनिधित्व करेगा। तैराक राजेन्द्र का कहना है कि कभी हंसी का पात्र समझा जाता था। परंतु अब खेल में नाम कमाने के बाद मजाक उड़ाने वाले लोग ही सम्मान करने लगे हैं। कामयाबी छूने के लिए चल पड़े कदम अब पीछे नहीं हटेंगे। नन्हे तैराक का ख्वाब है कि तैराकी में बेहतर मुकाम हासिल कर पैराओलंपिक में पहुंचे और मेडल लेकर भारत का नाम रोशन करे।

 

Sikar news : 40 फीट गहरे कुएं में तैयारी

बतौर राजेन्द्र का कहना है कि कद छोटा होने के कारण साथी उसके साथ खेलना तक पसंद नहीं करते थे। गांव में खेल के और कोई साधन भी नहीं थे। पहले जोहड़ में तैरना शुरू किया फिर वहां भी पानी सूख गया तो गांव के 40 फीट गहरे कुएं में उतरकर तैराकी का अभ्यास करने लगा। हालांकि कुएं की चौड़ाई आठ मीटर ही थी। शुरू में कठिनाई भी हुई लेकिन, बाद में उसमें भी उल्टा तैरने में महारथ हासिल कर ली। इसके बाद पहली बार राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल हुआ और गोल्ड मेडल जीतने पर तैराकी को ही जीवन का ध्येय बना लिया। हालांकि इससे पहले घर पर उसे लेने सर्कस वाले भी आए थे। लेकिन, सर्कस में जोकर बनने से ज्यादा मैने कुछ अलग करने की ठानी और कुछ हद तक उसे पूरा भी कर दिखाया है।

 

Sikar news : मजदूरी करती है मां, पिता का हुआ निधन

राजेन्द्र के पिता का साया बहुत पहले उसके सिर से उठ चुका है। पांच भाई-बहनों में राजेन्द्र सबसे छोटा है। परिवार की स्थिति कमजोर होने के कारण मां भी मजदूरी कर परिवार का गुजारा चला रही है। तंगी के कारण बीए की पढ़ाई का खर्चा भी केशवानंद स्कूल के निदेशक रामनिवास ढ़ाका उठा रहे हैं। यहीं उसे स्वीमिंग का निशुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शारीरिक शिक्षक महेश नेहरा ने बताया कि दिव्यांग राजेन्द्र से मुलाकात ट्रेन के सफर में हुई थी। बातों में प्रतिभा का पता चला तो परिजनों से मशवरा कर राजेंद्र को खेल में और आगे बढ़ाने के लिए यहीं रख लिया। तब से राजेन्द्र पढ़ाई के साथ नियमित दिन में चार घंटे स्वीमिंग का अभ्यास करता है।

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